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"अपराजिता"

Wednesday, April 1, 2009

...मैं तुम्हारा!


थी इस रिश्ते की

शुरुआत कुछ अलग- सी

पर क्या अब तुम भी

जगती हो

रात- रात भर मेरी तरह?

पकड़कर हाथ मेरा चलना

तुम्हारे 'स्वप्निल अरण्य' में

क्या रास आने लगा है तुम्हें भी?

आगाज़ की बातें छोड़ो

अंजाम की बातें छोड़ो

इस बीच को खूब जीयो

और साथ में मुझे भी जिलाओ

मैं निराश ज़िन्दगी से

भटक- भटक कर ताकता हूँ

बस, बेबर्दाश्त अंजाम की और

यह मैं नहीं

मेरी प्रवृति का अंदाज़ है

मैं खोना जो नहीं चाहता

तुम्हें किसी शर्त पर

तुम्हीं तो वो हो

जो दे सकती हो साथ मेरा

या कर सकती हो

कोई सज़ा मुक़र्रर,

क्यूंकि प्रेम करना

है कोई गुनाह अगर

तो गुनाहगार हूँ

मैं तुम्हारा!


- "प्रसून"

Tuesday, April 8, 2008

तेरा ख़त फिर भी न आया


तेरी याद ने सबको ख़ूब रुलाया,
हाँ, तेरा ख़त फिर भी न आया !


जिस दिन चले गए यहाँ से
गया सारा मंज़र ही गुमसुम
देखते रहे थे सब हद -ए- निगाह तक
बस! दादी रोयी थी अपनी आह तक,


कुछ ने तो तेरी तस्वीर देखकर ही
रिश्ते को भी ख़ूब भुनाया,
हाँ, तेरा ख़त फिर भी न आया !


क्या कशिश थी तेरी हर बात में
हँसते थे तुम जब बात- बात में
आज मुस्कराना सबका है दुश्वार
और 'रोना' बन गया हो जैसे खिलवाड़,


तेरी ख़बर की थी सबको ज़रूरत
पर डाकिए ने भी मुँह चिढ़ाया,
हाँ, तेरा ख़त फिर भी न आया !


जाने कहाँ गयी आज तेरी आगोश
ख़ुद में ही हैं सब खामोश
ख़तम हुआ है सबका धीरज
ज़िन्दगी हो गयी हो जैसे नीरस,


तेरी इक झलक को कुछ तो हैं अब भी बेताब
पर ज़ालिम दूरी ने सबको फुसलाया,
हाँ, तेरा ख़त फिर भी न आया !


- "प्रसून"

Saturday, March 29, 2008

जब तुम अपनी अदाओं में अकड़ती हो


लगता है, जैसे पूरी फ़िज़ा मचलती हो
जब तुम अपनी अदाओं में अकड़ती हो।


किसी की मुस्कराहट का तू बहाना है अब तक
क्या इतना भी तूने ना जाना है अब तक !
तेरी हँसी से होता है किसी की हँसी का फ़ैसला
तेरी नाराज़ नज़रों से उसका गिरता है हौसला ।

डर-सा जाता है रह- रहकर बेचारा
कभी प्यार बाँटने में जो तुम सोचती- संभलती हो,
जब तुम अपनी अदाओं में अकड़ती हो ।

तेरा आना- जाना सच में, हवाओं का झोंका है
फिर हवाओं को किसी ने कब तक रोका है !
तू रोज़ मिलेगी, किसी को ख़ूब है ये आस
बैठा है जबकि कोई कब से बेहोश- बदहवास !

आ जाओ पास, प्यार कितना छलकता है
मुस्करा कर भी बगल से कभी जो गुज़रती हो,
जब तुम अपनी अदाओं में अकड़ती हो।

कोई तन्हाई में तेरे बिना रहे तो कैसे
अपनी बेबसी अपनी आहों से कहे तो कैसे !
किसी की आह की खामोश आवाज़ हो तुम
उसके हर बयान का मुखर अंदाज़ हो तुम ।

मानो, ना मानो, किसी का आगाज़- अंजाम हो
फिर किसी के लिए ख़ुद को इतना क्यूँ बदलती हो,
जब तुम अपनी अदाओं में अकड़ती हो ।


- "प्रसून"

Monday, January 28, 2008

दर्द कुछ नहीं होता है


जीवन के वे पल सुखद थे
इक पल में कई साल सजग थे
हमने पढी थी नयनों की भाषा
प्रेमोद्देश्य पर ज्यों दोनों असमर्थ थे।

मन से फिर क्यूँ छिटकी चिंगारी
सारे मंज़र क्यूँ ध्वस्त पड़े थे
तुमने ही पोषित किया था विचार,
दर्द कभी- कभी बड़ा पुष्ट होता है !

मौजूं हवाओं का साथ मिल था
मिले तुम भी उत्सुक- से मुझको
निखर पड़ा था फिर सारा यौवन
कुचला मचल- मचलकर हमने जिसको।

चकाचौंध की सौ साल उमर थी
नादान था यौवन का हर पहलू
पोर- पोर की उमंग ने समझा,
दर्द कभी तो रुष्ट होता है!

फूल भरे फिर जब आये मोड़
तुमने ही स्नेह- सम्पर्क बढाए थे
शूलों की सत्ता उफान चढी तो
पल में सारे भरम हटाये थे।

देखे दिल ने जो सपने चुनकर
वही दिवा में व्यस्त बने थे
आहों ने रो- रोकर महसूस,
दर्द बड़ा ही दुष्ट होता है।

जब छोटा था तुमसे दामन
मन ने मेरे सिसकी भरी थी
सारे अंतर्द्वंद्वों को फिर कुचलकर
अरमानों की सिगड़ी जली थी।

कहाँ कोई सुख बिखरा था
आंसू भी तो सूख पड़े थे
टीसों ने तब फिर यह जाना,
दर्द कुछ नहीं होता है।


-- "प्रसून"

Thursday, January 17, 2008

चाहे जहाँ में...




चाहे जहाँ में मैं भटकता ही फिरूं,
मगर मेरी नज़र बस तेरी ओर होती है !

सुनकर कभी देखना तुम मेरी आत्मा की आवाज़
और समझना, क्यों है इसमे इतनी तपिश !
तेरे कर्म-पथ की ना बाधा बनूँगा तुझे आवाज़ देकर
कर्म की असफलता की तुम ख़ुद महसूस करना ख़लिश !

क्योंकि प्रेम-भिक्षा मांगकर दिल खुद बेजार हो गया है
इसके भीतर का उमड़ता-घुमड़ता बादल बेकार हो गया है
तेरे प्रेम की विडम्बना ही है की कोई बूँद को तरसे
और तेरी इनायत से कहीँ बारिश घनघोर होती है,

चाहे जहाँ में मैं भटकता ही फिरूं,
मगर मेरी नज़र बस तेरी ओर होती है !

मेरी आत्मा के हर पन्ने पर तस्वीर तेरी उभर चुकी है
अब इससे अलग प्रेम की क्या परिभाषा जानना चाहती हो !
सच भी है कि बस मेरा प्रेम है ये तेरे लिए
तेरा 'अपना' वो है जिसे तेरी रूह अपना मानना चाहती हो !

क्योंकि प्रेम की परिभाषा का समंदर बहुत गहरा है
हर हारा हुआ खिलाड़ी इसके साहिल पे इसलिए तो ठहरा है !
इसकी लहरों की मार बेआवाज़ हो भले ही आज, पर
हर धड़कन की दबी आह इक दिन शोर होती है,

चाहे जहाँ में मैं भटकता ही फिरूं,
मगर मेरी नज़र बस तेरी ओर होती है !



- "प्रसून"

क्यूँ...


पहले कभी न ऐसा लगा,
दर्द न उठा कभी भीतर से
तेरी ख़ामोश आँखों ने
पहले कभी शिक़ायत न की,
पहले क्यूँ तेरी बातें
मैं उड़ा देता था हवाओं में,
पहले तेरा वक़्त- बेवक्त
हामी भरना हर बात में,
अब क्यूँ तेरी समझ
परिपक्व हो चली है,
क्यों रहती थी तू पहले
मेरे साथ चिपककर हमेशा,
क्यूँ मेरा साथ अब तुझे
कुछ सोचने को मजबूर करता है,
पहले तेरा हँसना
क्यों सिर्फ 'हँसना' था,
अब क्यों तेरी हर गति
मेरे लिए मायने रखती है,
क्यों तेरा साथ अब मुझे
रुस्वाइयों में भी गवारा है,
क्यों तेरा 'बिछुड़ना' पहले
आने वाले कल की देता था उम्मीदें,
क्यों अब तेरी जुदाई से

हो जाता हूँ विचलित,
क्यों तेरी हर बात,
क्यूँ मुझ पर राज करने लगी है...?


-"प्रसून"

Wednesday, January 16, 2008

अँतड़िया की इज़्ज़त


स्तन से चिपटे बच्चे को
जब देखा था
निश्चिन्तता से वो
पी रह था दूध,
और ऊंघ रही थीउसकी भिखारिन माँ
फटी- फटी- सी उसकी ब्लाउज़

झांकती- मटमैली पेटीकोट
बयाँ कर रही थीं
कि कितनी हो चुकी हैं सस्ती
दो जून की रोटियाँ !


- "प्रसून"

Tuesday, November 20, 2007

ग़ज़ल


ज़ख्म-ए-उल्फ़त से अब रंज ही रिसते हैं ।
खून के रिश्ते भी हो गए सस्ते हैं ॥


क्यूं फिर नादाँ दिल चाहे कोई हमसफ़र
झूठ ही हो गए जब सारे रिश्ते हैं ।

भटक ही गया इस राह पर कमसिन
न समझा, यहाँ सारे दोमुंहे रास्ते हैं ।

दिल को अब दर्द का तोहफ़ा ही मुबारक़ हो
ये नज़राना उनका सब तेरे ही वास्ते हैं ।

जिन्होंने तबस्सुम को अपने अश्कों से भिगोया हो
वही तो 'प्रसून' जग में रोकर भी हँसते हैं।



- " प्रसून"



[ शब्दार्थ :-- ज़ख्म- ए- उल्फ़त= मुहब्बत का घाव; रंज= दुःख; नादाँ= नादान; कमसिन= कम उम्र का; वास्ते= के लिए; तबस्सुम= मुस्कराहट; अश्क़= आँसू ]